सिमलीपाल काई चटनी को मिला जीआई टैग(लाल चींटी की चटनी)

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हाल ही में उड़ीसा के मयूरभंज जिले के सिमलीपाल काय चटनी को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग प्राप्त हुआ। बता दें कि इस चटनी को लाल बुनकर चीटियों से बनाया जाता है। यह चटनी अपने उपचार गुणों के कारण इस क्षेत्र में काफी लोकप्रिय है। इस चटनी को आदि वासी लोगों की पोषण सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है। उड़ीसा कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय यानी ओयू एटी भुवनेश्वर के वैज्ञानिकों ने इन चीटियों का विश्लेषण किया और पाया कि इसमें प्रोटीन कैल्शियम जस्ता विटामिन b12 लोहा मैग्नीशियम पोटेशियम जैसे पोषक तत्व शामिल है। साथ ही इसके सेवन से प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा मिलने के साथ बीमारियों को रोकने में मदद मिल सकती है। मयूरभंज जिले की कई स्वदेशी लोग इन चीटियों को जंगलों से इकट्ठा करते हैं और इनसे बनी चटनी बेचकर अपनी जीविका चला रहे हैं।

अब जानते हैं लाल बुनकर चीटियों के बारे में 

यह चीटियां मूल रूप से मयूरभंज जिले में पाई जाती हैं। यह पेड़ों पर कई घोस दों वाली कॉलोनियां बनाती हैं। यह चीटियां ज्यादातर आम, साल और कटहल जैसे पेड़ों पर निवास करती हैं। बता दें कि काई परिवारों में सदस्यों की तीन श्रेणियां होती हैं।

  1. श्रमिक: प्रमुख श्रमिक चीटियां अधिकतर नारंगी रंग की होती हैं। श्रमिक 5 से 6 मिलीमीटर लंबे होते हैं।
  2. प्रमुख श्रमिक: प्रमुख श्रमिक 8 से 10 मिलीमीटर लंबे मजबूत पैर और बड़े जबड़े वाले होते हैं।
  3. रानी श्रमिक: रानी चीटियां 20 से 25 मिलीमीटर लंबी और हरे भूरे रंग की होती हैं। इन्हें जैव नियंत्रण एजेंटों के रूप में भी जाना जाता है। क्योंकि वे आक्रामक होते हैं। और अपने क्षेत्र में प्रवेश करने वाले अधिकांश आर्थोपॉड का शिकार करते हैं।

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