Share Market News: भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार को थोड़ी रिकवरी जरूर देखने को मिली, लेकिन इससे बाजार की बड़ी तस्वीर नहीं बदली। Sensex और Nifty लगातार सातवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुए। महंगे कच्चे तेल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितता ने घरेलू शेयर बाजार के सेंटीमेंट पर दबाव बनाए रखा। Reuters के मुताबिक यह भारतीय बाजार की 2020 के बाद सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट की कड़ी है।
25 सितंबर को बाजार में आई मामूली राहत
24 सितंबर की तेज बिकवाली के बाद 25 सितंबर को बाजार ने कुछ संभलने की कोशिश की। शुक्रवार को Nifty 50 करीब 0.34% चढ़कर 23,140.50 पर बंद हुआ, जबकि Sensex 0.43% की बढ़त के साथ 73,895.74 पर पहुंचा। हालांकि सप्ताह के हिसाब से Nifty करीब 0.9% और Sensex लगभग 0.5% नीचे रहे।
इसका मतलब साफ है कि आखिरी कारोबारी दिन की हल्की तेजी के बावजूद पूरे सप्ताह बाजार पर बिकवाली का दबाव हावी रहा।
24 सितंबर को क्यों मचा था बाजार में हड़कंप?
गुरुवार यानी 24 सितंबर को भारतीय शेयर बाजार में तेज गिरावट देखने को मिली थी।
उस दिन:
Sensex 1,247.71 अंक टूटकर 73,580.54 पर बंद हुआ।
Nifty 383.70 अंक गिरकर 23,063.10 पर पहुंच गया।
Sensex में गिरावट करीब 1.67% और Nifty में 1.64% रही।
व्यापक बाजार में भी बिकवाली देखने को मिली।
India VIX में करीब 22.76% की तेजी दर्ज की गई।
यानी बाजार में सिर्फ कुछ चुनिंदा शेयरों की कमजोरी नहीं थी, बल्कि व्यापक स्तर पर risk-off sentiment दिखाई दिया।
महंगा Crude Oil बना शेयर बाजार के लिए बड़ा सिरदर्द
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कच्चे तेल की कीमतों में तेजी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में तेल आयात करता है।
24 सितंबर को Brent crude करीब 102 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ था। तेल की कीमतों में तेजी से भारत के आयात बिल, महंगाई और रुपये पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।
यही वजह है कि महंगा crude oil सिर्फ तेल कंपनियों की खबर नहीं है। इसका असर महंगाई, ब्याज दरों, रुपये और कंपनियों की लागत तक पहुंच सकता है।
US Bond Yield बढ़ने से भारतीय बाजार क्यों प्रभावित हुआ?
बाजार की चिंता का दूसरा बड़ा कारण अमेरिकी Treasury yields में तेजी रही।
24 सितंबर की बिकवाली के दौरान अमेरिकी 10-year Treasury yield 5% के ऊपर पहुंच गई थी। ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड से वैश्विक निवेशकों के लिए डॉलर आधारित fixed-income assets आकर्षक हो सकते हैं और इससे emerging markets में पूंजी प्रवाह पर दबाव पड़ सकता है।
इसी global liquidity concern के बीच भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने दबाव और बढ़ाया।
FPI बिकवाली ने भी बढ़ाई परेशानी
विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भारतीय बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक हैं। SEBI की वेबसाइट पर FPI निवेश के दैनिक और मासिक आंकड़ों के आधिकारिक स्रोत उपलब्ध हैं।
25 सितंबर की बाजार रिपोर्टों में भी विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली को भारतीय equities पर दबाव के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया। इसके विपरीत घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी ने बाजार को कुछ सहारा दिया।
यानी बाजार में पूरी तरह से खरीदार गायब नहीं हुए थे, लेकिन विदेशी बिकवाली का दबाव लगातार महसूस हुआ।
Insurance सेक्टर में भी क्यों आया दबाव?
24 सितंबर की तेज गिरावट में financial stocks खास तौर पर दबाव में रहे। इसके पीछे वैश्विक संकेतों के साथ-साथ insurance commission rules में प्रस्तावित बदलावों को लेकर बाजार की चिंता भी बताई गई।
इसका असर financial और insurance-linked stocks पर ज्यादा दिखाई दिया। बाजार की चाल यह भी दिखाती है कि किसी एक global trigger के बजाय इस समय कई factors एक साथ sentiment को प्रभावित कर रहे हैं।
सात सप्ताह की लगातार गिरावट का क्या मतलब है?
यह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
25 सितंबर को समाप्त सप्ताह के बाद भारतीय benchmark indices ने लगातार सातवां weekly decline दर्ज किया। Reuters के अनुसार यह 2020 के बाद भारतीय शेयर बाजार की सबसे लंबी weekly losing streak है।
NDTV Profit की रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा गिरावट के दौरान 3 अगस्त के करीब 24,573 के स्तर से 25 सितंबर तक Nifty लगभग 7% नीचे आ चुका था।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार हर अगले सप्ताह भी इसी दिशा में जाएगा। शेयर बाजार की दिशा कई घरेलू और वैश्विक कारकों पर निर्भर करती है और short-term movement का निश्चित अनुमान लगाना संभव नहीं है।
निवेशकों के लिए अभी सबसे बड़े market triggers क्या हैं?
आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर मुख्य रूप से इन संकेतकों पर रह सकती है:
1. Crude Oil Price: तेल की कीमतों में आगे की चाल भारत के inflation और import bill के लिए महत्वपूर्ण रहेगी।
2. US Treasury Yield: अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में लगातार तेजी emerging markets की liquidity को प्रभावित कर सकती है।
3. Foreign Investor Flows: FPI/FII की खरीद-बिक्री बाजार के sentiment के लिए महत्वपूर्ण रहेगी।
4. Geopolitical Situation: पश्चिम एशिया से जुड़ी घटनाओं का crude और global risk sentiment पर सीधा असर पड़ सकता है।
5. Rupee-Dollar Movement: कमजोर रुपया import-dependent sectors और inflation expectations के लिए चुनौती बन सकता है।
6. Domestic Institutional Buying: घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी बाजार में गिरावट के दौरान एक महत्वपूर्ण cushion का काम कर सकती है।
क्या शुक्रवार की तेजी से बाजार की दिशा बदल गई?
सिर्फ एक दिन की तेजी को trend reversal मानना जल्दबाजी होगी। शुक्रवार को Sensex और Nifty में recovery जरूर हुई, लेकिन पूरे सप्ताह दोनों indices गिरावट में रहे। Reuters की रिपोर्ट भी इसे पिछले कारोबारी सत्र की तेज गिरावट के बाद partial rebound के रूप में बताती है।
इसलिए मौजूदा स्थिति को समझने के लिए सिर्फ शुक्रवार की closing देखने के बजाय crude oil, US yields, FPI flows, रुपये और global geopolitical developments को एक साथ देखना ज्यादा जरूरी है।
निष्कर्ष
भारतीय शेयर बाजार इस समय कई बाहरी और घरेलू दबावों के बीच कारोबार कर रहा है। महंगा crude oil, ऊंची अमेरिकी bond yields, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और geopolitical uncertainty ने बाजार की धारणा को कमजोर किया है। 24 सितंबर की बड़ी गिरावट के बाद 25 सितंबर को थोड़ी recovery जरूर आई, लेकिन लगातार सातवें सप्ताह की गिरावट बताती है कि बाजार में uncertainty अभी बनी हुई है।
निवेशकों के लिए इस दौर में headlines के बजाय कंपनी के fundamentals, valuation, risk और अपने investment horizon को ध्यान में रखकर निर्णय लेना महत्वपूर्ण है। केवल एक-दो कारोबारी सत्र की तेजी या गिरावट को देखकर निष्कर्ष निकालना जोखिमपूर्ण हो सकता है।


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें