हम सभी होली के त्यौहार के बारे में जानते हैं लेकिन उसको मनाने का कारण बहुत कम लोगों को पता होता है। इसलिए आज हम आपको होली क्या है, होली क्यों मनाते हैं, होली का त्यौहार क्यों मनाया जाता है? इस सब के बारे में बताएंगे। होली का नाम सुनते ही मन में खुशी और उल्लास की भावना उत्पन्न होती है। बच्चों से लेकर बूढों तक बड़ी धूमधाम से इस त्योहार को मनाते हैं। हमारे भारत देश में बिना भेदभाव के सभी मिलकर इस त्योहार को मनाते हैं। होली का त्योहार सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में मनाया जाता है। इसीलिए इसे खुशियों का त्यौहार भी कहते हैं। होली एक हिंदू वसंत त्योहार है, जो भारतीय उपमहाद्वीप से उत्पन्न होता है। होली त्यौहार को मुख्य रूप से भारत और नेपाल में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इसको "त्योहारों का त्यौहार" और " रंगो का त्यौहार" कहा जाता है। होली हिंदुओं का प्रसिद्ध और प्रमुख त्योहार है और खास करके इंडिया में सबसे ज्यादा मनाया जाता है। लेकिन अब ये भारतीय उपमहाद्वीप और प्रवासी भारतीयों के माध्यम से एशिया और पश्चिमी दुनिया के अन्य क्षेत्रों में भी फैल गया है। मतलब अब यह पूरी दुनिया में मनाया जाने लगा है। आए जानते है, होली की कहानी:
माना जाता है कि प्राचीन भारत में राक्षस प्रवृत्ति वाला हिरण्यकश्यप नाम का राजा हुआ करता था। उसने सालों तक भगवान की प्रार्थना की। जिससे उसे अमर रहने का वरदान मिला। हिरण्यकश्यप को ये वरदान मिला था:- "उसे इंसान या कोई जानवर नहीं मार सकता था, ना ही किसी अस्त्र-शस्त्र से उसकी मृत्यु हो सकती थी, उसे ना घर के अंदर ना घर के बाहर, ना ही दिन में और ना ही रात में, ना ही धरती पर ना ही आकाश में मारा जा सकता था" यह वरदान पाकर हिरण्यकश्यप को घमंड हो गया और वह खुद को ही भगवान समझ बैठा। वो लोगों से खुद की भगवान की तरह पूजा करने के लिए कहने लगा। प्रजा के ऐसा ना करने पर उन पर अत्याचार करता था और खुद को ही उनका भगवान बताता था। दरअसल, हिरण्यकश्यप अपने भाई की मौत का बदला लेना चाहता था, जिसे भगवन विष्णु ने मारा था।
इस दुष्ट राजा का एक बेटा भी था, जिसका नाम था प्रहलाद। प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था और सिर्फ भगवान पर यकीन करता था। असुर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे को बहुत समझाया। लेकिन पिता के लाख मना करने के बावजूद भी प्रहलाद नहीं माना और भगवान विष्णु की पूजा करता रहा। उसके बेटे को छोड़कर बाकी सभी लोग डर की वजह से उसकी पूजा करते थे। उसने बेटे को मनाने के बहुत प्रयास किए लेकिन वह हर बार असफल रहा। आखिर में, बेटे द्वारा अपनी पूजा ना करने से नाराज राजा ने अपने बेटे को सभी लोगों के सामने जिंदा जलाकर मारने का निर्णय लिया, ताकि फिर कोई ऐसा दुस्साहस ना कर सके।
विष्णु भक्त प्रहलाद को मारने के लिए उसने अपनी बहन होलिका की मदद ली। होलिका को भगवान से वरदान में एक वस्त्र(शौल) मिली हुई थी जिसे पहन कर वो आग में नहीं जल सकती थी। राजा को लगता था कि होलीका प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाएगी। चूँकि होलिका आग में जल नहीं सकती थी, इसलिए होलिका बाहर आ जाएगी और उसका पुत्र आग में जलकर भष्म हो जाएगा।
षडयंत्र के अनुसार, जब होलीका प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठी तो प्रहलाद हाथ जोड़कर भगवान का जप करने लगा। भगवान ने उसकी प्रार्थना सुनी और तेज हवा(तूफान) चलादी, जिससे होलिका के शरीर पर से वरदान में मिला वस्त्र उड़ गया और होलिका जल गई। लेकिन विष्णु भक्त प्रहलाद के शरीर पर आग की लपटों का कोई असर नहीं हुआ। इस तरह से बुराई की हार और अच्छाई की जीत हुई।
इसी वजह से तब से लेकर अब तक, होली का त्योहार मनाया जाता है। इसी के चलते भारत के कई प्रांतों में होली से 1 दिन पहले बुराई के अंत के प्रतीक के तौर पर होली जलाई जाती है। जिसे "होलिका दहन" कहते हैं।
होली के त्यौहार को मनाने का उद्देश्य एक दूसरे के साथ अच्छे संबंध बनाना, प्रेम और भाईचारे के साथ मिल जुल कर रहना है।
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