Government of India issues guidelines for ICU: भारत सरकार ने आईसीयू के लिए जारी किए दिशानिर्देश

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सरकार ने इंटेंसिव केयर यूनिट यानी कि आईसीयू को लेकर एक गाइडलाइन जारी की, अपने आप में यह पहली इस तरह की गाइडलाइंस है, इसमें कहा गया है कि किन परिस्थितियों में मरीज को आईसीयू दिया जा आना चाहिए और किन परिस्थितियों में नहीं। हालांकि यह महज सुझाव है। इसका निर्णय डॉक्टर पर ही छोड़ा गया है। लेकिन क्योंकि यह पहली बार इस तरह की गाइडलाइंस आई हैं। आईसीयू के नियम लाने की आवश्यकता क्या थी। देखिए बहुत सारी शिकायतें ऐसी मिल रही थी कि बिना किसी वजह के डॉक्टर्स जो है आईसीयू में पेशेंट को डाल देते हैं। आईसीयू में डालने के बाद कई प्रकार के खर्चे बढ़ जाते हैं। इसके अलावा जिनको एक्चुअल में आईसीयू की आवश्यकता होती है उन्हें आईसीयू नहीं मिलता। बहुत सारी शिकायतें आईसीयू को लेकर थी और आईसीयू मतलब एक ऐसा लम्हा जब ऑलमोस्ट एक व्यक्ति और उसके परिवार जन ऐसी स्थिति में नहीं होते कि वह कुछ बड़ा निर्णय ले पाए। यही सब जो गड़बड़ हो रही थी इसे रोकने के लिए यह दिशानिर्देश आए हैं।
सरकार ने पहली बार अस्पताल के इंटेंसिव केयर यूनिट, यानी आईसीयू को लेकर एक गाइडलाइन जारी की है। इसे क्रिटिकल केयर मेडिसिन के 24 डॉक्टरों के एक्सपर्ट पैनल ने तैयार किया है। गाइडलाइन में उन मेडिकल परिस्थितियों को बताया गया है कि कब मरीज को आईसीयू में एडमिट करना है और कब नहीं। खासकर सर्जरी के बाद के मामलों में हालत बिगड़ने की आशंका और जटिल सर्जरी के मामलों में मरीज को आईसीयू में भर्ती करने की सिफारिश की गई है। साथ ही उन मरीजों को आईसीयू नहीं देने ने की बात कही गई है जिन्हें इसकी खास जरूरत नहीं होती या जिनकी हालत में सुधार की कोई उम्मीद नहीं होती। दरअसल आईसीयू में भर्ती के लिए पहले भी एक स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल था। किन मरीजों को भर्ती किया जाए और किन्हें नहीं लेकिन कई अस्पतालों में इसे लेकर अनदेखी पाई गई है। ऐसे में सरकार की इस गाइडलाइन को अहम माना जा रहा है। हालांकि यह गाइडलाइन बाध्यकारी नहीं है और डॉक्टर के विवेक पर छोड़ दिया गया है कि किसे आईसीयू मिलना चाहिए और किसे नहीं। फिलहाल तो गाइडलाइन में सिफारिश की गई है कि अगर किसी को सांस लेने में दिक्कत, हार्ट अटैक, खून की उल्टी हो रही है तो इन हालातों में मरीज को आईसीयू बेड मिलना चाहिए। वहीं मेजर और जटिल सर्जरी से गुजरने वाले मरीज को भी आईसीयू देने की बात कही गई है। क्योंकि ऐसे मरीजों को 24 घंटे निगरानी में रखने की जरूरत पड़ती है। ताकि मरीज के पल्स रेट, हार्ट रेट, बीपी की पूरी निगरानी रखी जा सके। गाइडलाइंस के मुताबिक सिर्फ मरीज के कहने पर डॉक्टर कोई निर्णय ना ले। जब डॉक्टर को ऐसा लगे कि मरीज को ट्रीटमेंट के हिसाब से आईसीयू में रखना है। तभी वह आईसीयू बेड अलॉट करें। आमतौर पर सामान्य बेड के चार्ज के मुकाबले आईसी बेड का चार्ज पाच से 10 गुना तक ज्यादा होता है। ऐसे में कई ऐसी शिकायतें भी सुनने को मिलती है कि अस्पताल ने पैसा बनाने के लिए मरीज को बेवजह ज्यादा समय के लिए आईसीयू में रख दिया। इससे मरीज के इलाज का खर्च बढ़ जाता है। वहीं कई बार तो मरीज की गंभीर हालत समझकर तीमारदारों की ओर से आईसीयू देने की मांग की जाती है। ऐसे में गाइडलाइन में कहा गया है कि डॉक्टर दबाव में आने की बजाय मरीज को इस बात के लिए राजी करें कि आईसीयू लेने की कोई जरूरत नहीं है। मरीज सामान्य इलाज से ठीक हो सकता है। दरअसल आईसीयू संबंधी गाइडलाइन की जरूरत इसलिए भी पड़ी। क्योंकि देश में आईसीयू बेडस की कमी है। इसके लिमिटेड रिसोर्स है देश भर में। महज 1 लाख के करीब आईसीयू बेड मौजूद है। ऐसे में किन्हीं विपरीत परिस्थितियों में अस्पताल और डॉक्टर का दायित्व है कि जरूरत पड़ने पर किसी मरीज को आईसीयू बेड मिलने में दिक्कत ना आए और बेवजह किसी को आईसीयू में ना रखा जाए। फिलहाल तो सरकार ने अपनी ओर से गाइडलाइन जारी कर दी है। अब इसे निभाने की जिम्मेदारी अस्पताल और डॉक्टरों की है।



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