वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने 20 फरवरी को 'विश्व सामाजिक न्याय दिवस' के रूप में घोषित किया था।इस दिवस को मनाने का उद्देश्य सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और गरीबी, लिंग, अशिक्षा, शारीरिक व धार्मिक भेदभाव को खत्म करने के लिए विभिन्न समुदायों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ लाना है, ताकि सामाजिक रूप से एकीकृत समाज बनाया जा सके।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने 10 जून, 2008 को निष्पक्ष वैश्वीकरण के लिए 'सामाजिक न्याय पर ILO घोषणा' को सर्वसम्मति से अपनाया था। यह ILO के गठन(वर्ष 1919) के बाद से अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन द्वारा अपनाए गए सिद्धांतों और नीतियों पर तीसरी बड़ी घोषणा है। यह घोषणा वर्ष 1944 की 'फिलाडेल्फिया घोषणा' और वर्ष 1998 की 'कार्य में मौलिक सिद्धांतों और अधिकारों की घोषणा' को आधार बनाती है।
सामाजिक न्याय, भारत में सामाजिक न्याय और संवैधानिक प्रावधान
सामाजिक न्याय का तात्पर्य देशों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और विकास के लिए आवश्यक सिद्धांत से है, जो न केवल अंत: देशीय समानता अपितु अंतर्देशीय समानता की परिस्थितियों से भी संबंधित है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय को संविधान के लक्ष्यों के रूप में निर्धारित किया गया है।
भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय की अवधारणा को किसी वर्ग-विशेष; यथा- अनुसूचित जाति-जनजाति आदि के लिए विशेष व्यवस्था के माध्यम से भी अभिव्यक्त किया गया है। अनुच्छेद 14 में 'विधि के समक्ष समता' और 'विधियों का समान संरक्षण' दोनों को स्थान दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने मेनका गांधी मामले में अनुच्छेद 21 की पुनः व्याख्या करते हुए इसमें मानवीय प्रतिष्ठा के साथ गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार, निजता का अधिकार, बंधुआ मजदूरी करने के विरुद्ध अधिकार, सामाजिक सुरक्षा व परिवार के संरक्षण का अधिकार आदि को शामिल किया है।
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