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----- जिम्मेदारी -----



"मुझे दाल खानी ही नही है..मुझे बिरयानी खानी है. अभी बनायो."  माँ शायद गुस्से में कुछ बोलने वाली थी उससे पहले दीदी बोल पड़ी "सनी, 14 साल के हो गए हो,थोड़े जिम्मेदार बनो. देख रहे हो माँ अभी टॉयफोइड से उठी हैं. खाना बन रहा है शुक्र समझो. कम से कम उनकी तबियत का लिहाज करो.

"आप तो मुझसे भी बड़ी हो. तो खुद भी तो जिम्मेदारी समझो. मम्मी को क्यों बनाने दे रही हो खाना. तुम बनायो." "सर.. सुबह का नाश्ता मैं ही बना कर गयी थी. रात का खाना भी बनाउंगी. मेरी जगह एग्जाम देने कॉलेज तू जाएगा?" "अरे यार, इतने लेक्चर सुनकर तो भूख ही मर गयी. रखो अपनी दाल रोटी, मैं चाउमीन खाने जा रहा हूँ."

मम्मी को शायद कमजोरी थी, वो बिना कुछ कहे चुपचाप कमरे में लेट गयीं. बहन बड़बड़ा रही थी जिसे अनसुना कर अपना जैकेट, कैप लगाकर मैं साईकल लेकर निकल गया. गली से मुड़ा ही था कि कोहरे में किसी चीज़ से टकरा कर गिर गया.
 पूरा गर्म कपड़ों में पैक था तो ज्यादा चोट नही लगी, पर उस लड़के पर बड़ा गुस्सा आया जो गली के कोने पर पेड़ की टूटी हुई लकड़ियाँ चुन रहा था. एक तो घर से मूड खराब उस पर ये "अबे कुछ पागल है क्या"? नहीं भईया...वो..वो...लकड़ियाँ इकट्ठी कर रहा था. बहुत ठंड है आज मेरी तो ज़ुबान से बोला भी ना जा रहा है." ऐसा कह कर वो हँसा.

तब गौर से देखा. उम्र कोई 12-13 साल होगी. चोगा टाइप जर्सी पहने, शायद किसी बड़े आदमी की है तभी घुटने तक ढकी है. नीचे से नंगा लगा लेकिन जब झुका तो देखा एक नेकर पहना था जो जर्सी से ढका था. साईकल की टक्कर से उसे चोट लगी होगी पर शायद वो इन सबसे ऊपर किसी और ही धुन में है.

सोचा भाड़ में जाये, मैं निकलूं. तभी वो बोल पड़ा "भईया तुम्हारे पास पुराने मोज़े होंगे? ठंड से पैर सुन्न हो रहे हैं. अब तो कांटे से चुभ रहे हैं.
 हम्म्म्म मोजे तो हैं पुराने. कोई अंगूठे से फटा है कोई एड़ी से. मैंने मन में सोचा. पर अब कौन वापस जाए लेने? 

नहीं हैं, मेरे मुंह से निकला. कोई नहीं..कुछ खाने को होगा? मैं आपको पैसे दे दूंगा. कोई दुकान वाला उधार नही दे रहा. मेरे पास बस 10 रुपए है, बोतल बेचकर मिले हैं.अब इससे ज्यादा कठोर नही बन सकता मैं. अंदर कुछ घुल कर बह सा गया. वो उम्मीद से देख रहा था. पपड़ी जमे होंठों से मुस्कुरा रहा था. "खाने का अभी तो नही है..दिलवा सकता हूं. पर पैसे नही दूंगा." "ठीक है.." मैंने उसे साईकल पर बैठाया और गली के आखिरी मोड वाली दुकान पर पहुँचा.

क्या लेना है? "कुछ भी जिससे पेट भर जाए." देखो मेरे पास सिर्फ 50 रूपए हैं. तुम खुद देखो क्या करना है? उसने शायद सुना नहीं. मैंने देखा वो शीशे में रखी चॉकलेट को देख रहा था. 

चॉकलेट चाहिए? "नही..महंगी है पेट भी नही भरेगा". मैंने कभी चॉकलेट के बारे में इतना नही सोचा. "ठीक है ब्रेड ले लो." वो दूध भी चाहिए था. वो कुछ हिचकिचाते हुए बोला. "अब तुम फैल रहे हो.".. मैं झुंझुलाया. "भईया वो..छोटी बहिन है एक, दूध पीती है". "तो मैंने क्या तेरे पूरे घर की जिम्मेदारी ली है?" नहीं..जिम्मेदारी तो मेरी है. मैं बड़ा हूं. अचानक दीदी की बात याद आयी "14 का हो गया, कुछ तो जिम्मेदार बन." "चल ठीक है. एक ब्रेड एक दूध की थैली लेकर उसे दी. वो पैरों में लेटने को तैयार था.

"भईया अपना घर बता दो, मैं पैसे दे जाऊँगा." "दे देना कभी मिलोगे तो दोबारा" तेरे पापा क्या करते हैं?" "दूसरी बहिन हुई ना मेरी, तो पापा चले गए." वो उत्साहित सा चल दिया. मैंने गौर किया वो सिर्फ ब्रेड और दूध की थैली नही थी. मोज़े और लिहाफ भी बन गयी थी. क्योंकि उसकी ठंड से कांपती ज़ुबान और सुन्न पैरों की चाल बदल गयी थी.

सोचा अब चाउमीन तो गयी, इसके पीछे ही चलके देखूं कहाँ जाता है? देखा एक अंडे की ठेले पर रुका. अच्छा बच्चे.. ये बात... अंडे चल रहे है..साला नोटंकी धोखेबाज. लेकिन उसने सिर्फ एक अंडा लिया...मुझे ध्यान आया" भईया मेरे पास सिर्फ 10 रुपए हैं.'

वो रेल की पटरी के किनारे बसे एक झुग्गियों के शहर में घुसा. गली इतनी बड़ी की एक इंसान निकल पाए. मैं बड़ी मुश्किल से साईकल घुसा पाया.एक ईंट की बनी पर मिट्टी से चिनाई की हुई झुग्गी में घुसा. पीछे जाना नहीं चाहता था पर रुक भी नही सका. अंदर झांक कर देखा. शायद खाना मिलने की खुशी में उसका ध्यान नही था मुझ पर. 

एक लगभग टूटी हुई बान की चारपाई पर एक औरत लेटी हुई थी. घर पर कम्बल ओढे लेटी माँ याद आयी. पर यहाँ माँ थी किसी की, पर कम्बल नहीं था. तीन चार चादरें इक्कठी करके डाली थीं. तिस पर औरत छाती में घुटने घुसाये थी. एक करीबन 9 माह की बच्ची भी एक लकड़ी के पीढ़े पर लेटी थी जिसे गिरने से बचाने को चारों तरफ गत्तों का ढेर लगाया था. उसने गर्म कपड़े पहने थे शायद किसी ने दिए होंगे. 

एक 7 साल की लड़की कोने में रखी अंगीठी में टूटी हुई लकड़ी डाल कर हाथ सेक रही थी. लड़के ने घुसते ही अपनी मां की चादर ठीक की. उस एक पल में मैं शर्म से गड़ गया. मैं अभी क्या करके आया हूँ घर पर अपनी माँ के साथ.
 उसने ब्रेड निकाली "ले सीमा ब्रेड खा ले." लड़की चहक कर पास आई फिर उदास लहजे से बोली "भईया सूखी ब्रेड अटकती है." "पानी रख ले साथ में." फिर उसने दूध बिना उबाले ही बोतल में करके छोटी बच्ची के मुंह मे लगा दिया. शायद उबालने का टाइम नही था उसके पास क्योंकि बच्ची भूख से चीत्कार रही थी. "माँ, ये अंडा लो.. कमजोरी है तुझे थोड़ा ताकत आएगी इससे'. "तू भी कुछ खा ले." "खाऊंगा अभी ब्रेड..पानी ले आऊं." वो पानी लेने निकलता उससे पहले ही मैं वहाँ से हट गया. अब घर जा रहा हूँ. माँ के हाथ की दाल रोटी खाने और मोज़े लेने.

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