मरते मरते देश को जिंदा मगर कर जाएंगे।
ये पंक्तियां इसके लेखक की स्वतंत्रता की उत्कट इच्छा को ही नहीं दर्शाती है बल्कि बताती है स्वतंत्रता की चाह और क्रांतिकारी भावना उनके शरीर के हर इंच में रची बसी है। जी हां बात हो रही है। अपनी बहादुरी से अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ाने वाले क्रांतिकारी अमर शहीद व काकोरी कांड या काकोरी ट्रेन आरक्षण के महानायक रामप्रसाद बिस्मिल की। 11 जून को देश इनकी जयंती मना रहा है। रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था। वह कम उम्र से ही आर्य समाज से जुड़ गए थे। देशभक्ति उनके खून में बहती थी और ये भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की प्रमुख क्रान्तिकारी थीं। रामप्रसाद बिस्मिल उल्लेखनीय भारतीय क्रांतिकारियों में से एक थे जिन्होने ब्रिटिश उपनिवेशवाद की जड़ें उखाड़ने और साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ संघर्ष किया। उन्होने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया, जिसमें भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता शामिल हुए। बिस्मिल ने कई महत्वपूर्ण संघर्ष जैसे 1918 का मैनपुरी षड्यंत्र 1925 के काकोरी ट्रेन रॉबरी भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई। काकोरी कांड के लिए बिस्मिल और अन्य क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर उनपर मुकदमा चलाया गया। इसके बाद रामप्रसाद बिस्मिल को अशफाकउल्ला खान और ठाकुर रोशन सिंह के साथ 19 दिसंबर 1927 को फांसी दे दी गई। बिस्मिल बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। उन्होने बिस्मिल राम व अज्ञात उपनामों से उर्दू व हिन्दी में देश भक्ति कविताएं लिखीं। उन्होने 28 जनवरी 1918 को देशवासियों के नाम नामक एक पुस्तिका प्रकाशित की और इसे अपनी कविता मैनपुरी की प्रतिज्ञा के साथ वितरित किया।
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