हाल ही में किए गए पुरातात्विक अन्वेषणों में शोधकर्ताओं ने प्राचीन टेराकोटा मूर्तियों का पता लगाया है। ये मूर्तियाँ कर्नाटक के मूडबिद्री के पास मुदु कोनाजे में मेगालिथिक डोलमेन साइट पर खोजी गई हैं। ये हड्डी और लोहे के टुकड़ों के साथ संरक्षण की विभिन्न अवस्थाओं में पाई गई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, ये मूर्तियाँ 800-700 ईसा पूर्व की थीं। पाई गई आठ मूर्तियों में दो गाय, एक मातृ देवी, दो मोर, एक घोड़ा, एक देवी माँ का हाथ और एक अज्ञात वस्तु है। बता दें कि दु कोनाजे में महापाषाण स्थल की खोज और रिपोर्ट इतिहासकार और शोधकर्ता पुंडिकई गणपय्या भट ने 1980 के दशक में की थी। यह स्थल मूडबिद्री-शिरथडी रोड पर स्थित है, जो मूडबिद्री से क़रीब 8 किमी दूर है। मुदु कोनाजे में महापाषाणिक संदर्भ में पाई गई टेराकोटा मूर्तियाँ भारत की एक दुर्लभ खोज हैं। यह सबसे बड़ा महापाषाण डोलमेन स्थल था। जिसमें एक पत्थर की पहाड़ी की ढलान पर नौ डोलमेन शामिल थे, लेकिन केवल दो डोलमेन ही सुरक्षित हैं और बाकी कब्रें बर्बाद हो गई हैं। भारत में महापाषाण संस्कृति को उसके विभिन्न प्रकार के दफ़नाने और लोहे के उपयोग से जाना जाता है, डोलमेन उनमें से एक है।
हाल ही में किए गए पुरातात्विक अन्वेषणों में शोधकर्ताओं ने प्राचीन टेराकोटा मूर्तियों का पता लगाया है। ये मूर्तियाँ कर्नाटक के मूडबिद्री के पास मुदु कोनाजे में मेगालिथिक डोलमेन साइट पर खोजी गई हैं। ये हड्डी और लोहे के टुकड़ों के साथ संरक्षण की विभिन्न अवस्थाओं में पाई गई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, ये मूर्तियाँ 800-700 ईसा पूर्व की थीं। पाई गई आठ मूर्तियों में दो गाय, एक मातृ देवी, दो मोर, एक घोड़ा, एक देवी माँ का हाथ और एक अज्ञात वस्तु है। बता दें कि दु कोनाजे में महापाषाण स्थल की खोज और रिपोर्ट इतिहासकार और शोधकर्ता पुंडिकई गणपय्या भट ने 1980 के दशक में की थी। यह स्थल मूडबिद्री-शिरथडी रोड पर स्थित है, जो मूडबिद्री से क़रीब 8 किमी दूर है। मुदु कोनाजे में महापाषाणिक संदर्भ में पाई गई टेराकोटा मूर्तियाँ भारत की एक दुर्लभ खोज हैं। यह सबसे बड़ा महापाषाण डोलमेन स्थल था। जिसमें एक पत्थर की पहाड़ी की ढलान पर नौ डोलमेन शामिल थे, लेकिन केवल दो डोलमेन ही सुरक्षित हैं और बाकी कब्रें बर्बाद हो गई हैं। भारत में महापाषाण संस्कृति को उसके विभिन्न प्रकार के दफ़नाने और लोहे के उपयोग से जाना जाता है, डोलमेन उनमें से एक है।
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