आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और पंजाब में विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संगठनों ने मच्छरों के खतरे को दूर करने के लिए स्थानीय जल निकायों में मच्छर मछली छोड़ी है। चलिए अब जानते हैं मच्छर मछली के बारे में, इसे गम्बुसिया मछली के नाम से जाना जाता है। मच्छरों के लार्वा को नियंत्रित करने के लिए जैविक एजेंट के रूप में इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। इस मछली के दो प्रजातियां है:
- गम्बुसिया एफिनिस
- गम्बुसिया होलब्रुकी
मच्छर मछली की यह प्रजातियां अमेरिका में उत्पन्न हुई थी। लेकिन आज वैश्विक स्तर पर पाई जाती हैं। यह अपने हानिकारक पारिस्थितिक प्रभाव के लिए कुख्यात है। जिसमें देशी जीवों को विस्थापित करना और उनका शिकार करना शामिल है। गौर तलब है कि गम्बुसिया सबसे व्यापक रूप से मीठे पानी की मछली के रूप में जानी जाती हैं।
भारत में मच्छर मछली का प्रयोग
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर भारत का नोडल चिकित्सा अनुसंधान संगठन देश में मच्छर प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साल 1928 में गम्बुसिया को पहली बार भारत में प्रस्तावित किया गया था। इसका उद्देश्य था कि नई प्रजातियां मच्छरों के लारवा का शिकार करेंगी, जिससे मच्छरों की आबादी कम हो जाएगी। वन्यजीव जीव वैज्ञानिक और संरक्षक मच्छर मछली को 100 सबसे हानिकारक आक्रामक विदेशी प्रजातियों में से एक मानते हैं। ऑस्ट्रेलिया में इस मछली के कारण वहां की स्थानिक मछली प्रजाति विलुप्त हो रही है। वहीं भारत में इससे माइक्रो हिला टैडपोल की प्रजाति में गिरावट देखने को मिल रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1982 में गम्बुसिया को मच्छर नियंत्रण एजेंट के रूप में अनुशंसित करना बंद कर दिया, लेकिन इसके बाद भी मच्छर नियंत्रण के लिए इन प्रजातियों का प्रयोग किया जा रहा है।
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