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लिवइन पार्टनर्स को नहीं मिलेगा, सरोगेसी का लाभ

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हाल ही में केंद्र ने सरोगेसी अधिनियम के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया। इसमें सरकार ने कहा कि लिवइन पार्टनर समलैंगिक जोड़ों को सरोगेसी कानून के तहत सेवाओं का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। सरकार के मुताबिक ऐसे जोड़ों को सरोगेसी की जैसे देना इस एक्ट के दुरुपयोग को बढ़ावा देगा।केंद्र की ये प्रतिक्रिया उस याचिका पर आधारित है, जिसमें सरोगेसी कानून 2021 के उस प्रावधान को चुनौती दी गई है, जो अविवाहित महिलाओं को इच्छुक महिला की परिभाषा के दायरे से बाहर रखता है। इस याचिका पर सरकार के तर्क की बात करें तो सरकार ने कहा कि अधिनियम ये स्पष्ट करते हैं कि सरोगेसी के सहित प्रजनन का विकल्प चुनने वाले जोड़े को कानूनी रूप से विवाहित जैविक पुरुष और महिला होना चाहिए। ऐसे जोड़ों से सरोगेसी के जरिये पैदा हुए बच्चे हेतु बेहतर भविष्य सुनिश्चित करना मुश्किल होगा। इसके अलावा लिवइन पार्टनर सरोगेसी के जरिये पैदा हुए बच्चे की सुरक्षा हेतु कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। सरकार ने कहा कि हालांकि कोर्ट ने समलैंगिक और लिवइन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है, लेकिन ऐसे जोड़ों के संबंध में न तो कोई विशेष प्रावधान पेश किए गए हैं और ना ही उन्हें कोई अतिरिक्त अधिकार दिया गया है गौरतलब है कि अपनी पत्नी के अलावा किसी दूसरी महिला की कोख को किराए पर लेकर अपने बच्चे को पालना सरोगेसी कहलाता है। सरोगेसी विनियमन अधिनियम 2021 के अनुसार महिला जो 35 से 45 वर्ष की आयु के बीच विधवा तलाकशुदा है या कानूनी रूप से विवाहित महिला और पुरुष के रूप में परिभाषित युगल सरोगेसी का लाभ उठा सकते हैं।

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