पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने मध्य एशियाई फ्लाइवे यानि CAF में प्रवासी पक्षियों एवं उनके आवासों के संरक्षण प्रयासों को मजबूत करने के लिए पक्षकार देशों की बैठक आयोजित की। इसे सहित राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम या कन्वेंशन ऑन माइग्रेटरी, स्पीशीज यानि यूएनईपी सीएमएस के सहयोग से आयोजित किया गया था। चलिए जानते हैं सीएमएस या बॉन कन्वेंशन के बारे में, इसका पूरा नाम दीकन्वेंशन ओन माइग्रेटरी स्पीशीज है। ये यूएनईपी के अधीन की गई एक अंतर सरकारी पर्यावरण संधि है, जिसे बॉन कन्वेंशन के नाम से भी जाना जाता है। ये एकमात्र कन्वेंशन है जो जंगल से प्रजातियों को लेने या उनके इस्तमाल से संबंधित है। इस संधि पर बॉन जर्मनी में 1979 में हस्ताक्षर किए गए थे और 1983 में लागू हुई थी। 1 मार्च 2022 तक सीएमस में 123 पार्टियां हैं। भारत 1983 से विशेष कन्वेंशन का एक पक्षकार है। सीएमएस के अंतर्गत दो परिशिष्ट हैं।
- इसमें संकटग्रस्त प्रवासी प्रजाति को सूचीबद्ध किया गया है
- इसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता वाली प्रवासी प्रजातियों को सूचीबद्ध किया गया है।
इसका उद्देश्य स्थलीय समुद्री और एवियन प्रवासी प्रजातियों को उनकी सीमा में संरक्षित करना है। प्रवासी प्रजाति ऐसी प्रजाति होती है जो भोजन, तापमान, आशा आदि जैसे कारकों के कारण चक्रीय रूप से और अनुमानित रूप से एक या अधिक राष्ट्रीय अधिकारक्षेत्र की सीमा को पार करती है। ये वैश्विक स्तर पर संरक्षण उपायों को संचालित करने के लिए कानूनी मील रखता है। सीएमएस के तहत कानूनी उपकरण कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौतों से लेकर कम औपचारिक ओएमयू तक हो सकते हैं। भारत में निम्नलिखित के संरक्षण और प्रबंधन पर सीएमएस के साथ गैर कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता ज्ञापन यानि एमओयू पर हस्ताक्षर की है। यह साइबेरियन क्रेन 1998 समुद्री कछुए 2007, डगौंस 2008 और रैप्टर्स 2016 दुनिया के 2.4% भूमि क्षेत्र के साथ भारत ज्ञात वैश्विक जैवविविधता में लगभग 8% योगदान देता है। भारत अमूर फाल्कन बार हेडेड गीज डा। डगौम बैक वेल आदि सहित कई प्रवासी प्रजातियों को अस्थाई आश्रय प्रदान करता है।
सीएएफ
यह पक्षियों के लिए प्रमुख प्रवासी मार्ग है जो आर्कटिक महासागर से हिंद महासागर तक 30 दहशत फैला हुआ है। भारतीय उप महाद्वीप सीएएफ का एक हिस्सा है। भारत में प्रवासी पक्षियों की 400 से अधिक प्रजातियां हैं, जिनमें साइबेरियन क्रेन और लेसर, वाइट फ्रंट गूज जैसी संकटग्रस्त और लुप्तप्राय प्रजाति शामिल है। फ्लाइवे अपने वार्षिक चक्र के दौरान पक्षियों के एक समूह द्वारा उपयोग किया जाने वाला रक्षा क्षेत्र है, जिसमें उनके प्रजनन क्षेत्र ठहराव क्षेत्र और सर्दियों के क्षेत्र शामिल हैं। सीएएम सचिवालय ने पक्षियों के प्रवास के संबंध में वैश्विक स्तर पर नौ प्रमुख फ्लाईट की पहचान की है।

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