विदेश मंत्री एस जयशंकर ने नई शिक्षा नीति के तहत भारत की नौ शास्त्रीय भाषाओं में से एक के रूप में फारसी को शामिल करने की घोषणा की है। यह पहल भारतीय शैक्षिक ढांचे के तहत फारसी की समृद्ध विरासत की अधिक समझ और सराहना को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार छह शास्त्रीय भाषाओं के अलावा पाली, फारसी और प्राकृत भाषाओं की समृद्धि और भावी पीढ़ी के संवर्धन के लिए इन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए।
शास्त्रीय भाषाओं के वर्गीकरण का आधार
फरवरी 2014 में संस्कृति मंत्रालय द्वारा किसी भाषा को शास्त्रीय भाषा घोषित करने के लिए निम्नलिखित दिशा निर्देश जारी किए गए हैं। इसके प्रारंभिक ग्रंथों का इतिहास 1500 से 2000 वर्ष से अधिक पुराना हो, प्राचीन साहित्य या ग्रंथों का एक हिस्सा हो, जिसे बोलने वाले लोगों की पीढ़ियों द्वारा एक मूल्यवान विरासत माना जाता हो, साहित्यिक परंपरा में मौलिकता हो, शास्त्रीय भाषा और साहित्य आधुनिक भाषा और साहित्य से भिन्न है। इसलिए इसके बाद रूपों के बीच असमानता भी हो सकती है। वर्तमान में छह भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया गया है। तमिल भारत की पहली भाषा थी। जिसे 2004 में शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया था। जबकि संस्कृत को 2005 में, कन्नड़ को 2008 में, तेलुगु को 2008 में, मलयालम को 2013 में और उड़िया को 2014 में शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।
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