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बुधवार, 17 जनवरी 2024

गाड़ियों के टायर काले के अलावा दूसरे रंगों के क्यों नहीं होते?

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नेसेसिटी इज द मदर ऑफ इंवेंशंस, ठीक हमने भी कुछ वैसा ही किया। जरूरत हुई लंबा रास्ता जल्द तय करने की, तो इन्वेंट हुआ पहिया, पहिया आया तो गाड़ियां बनी, आज की तस्वीर यह है कि हम तरह-तरह की गाड़ियों में सफर करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि जिस गाड़ी के रंग लाइटिंग और सजावट में आप लाखों खर्च कर देते हैं। उसके पहिए काले क्यों होते हैं। साइकिल हो या बाइक स्कूटी हो या वैन यहां तक कि एरोप्लेन के भी पहिए क्यों नहीं होते रंग बिरंगे, बल्कि होते हैं काले। तो चलिए गाड़ी का टायर क्यों होता है काले आए जानते है

इतिहास

शुरुआती टायर लोहे के पट्टों के बने होते थे। जिन्हें घोड़ा गाड़ियों या बैल गाड़ियों के लकड़ी के पहियों पर चढ़ाया जाता था। बैल गाड़ियों में अभी भी भी इस तरह के लोहे वाले टायरों का इस्तेमाल होता है। साल 1844 में चार्ल्स गुडियर ने रबर को वल्केनाइज किया। वल्केनाइजेशन एक साइंटिफिक प्रोसेस है। जिसमें रबर के किसी भी टाइप को हीट और सल्फर से सख्त किया जाता है। वल्केनाइज रबर हमारे शू सोल्स में इरेजर में और खिलौने बनाने में काम आती है। इनमें शॉक अब्जॉर्प्शन की बेहतर क्वालिटी होती है। स्कॉटिश इंजीनियर हुए रॉबर्ट विलियम थॉमसन इन्होंने साल 1845 में पहला न्यूमेटिक टायर बनाया। बेसिकली गाड़ियों में इस्तेमाल किए जाने वाले हवा वाले टायर। हालांकि इसके इन्वेंशन के वक्त काफी दिक्कतें आई लिहाजा यह उतना सफल भी नहीं रहा। पहला सफल न्यूमेटिक टायर बनाने का श्रेय जाता है जॉन बॉयर डनलप को, जिन्होंने साल 1887 में अपने 10 साल के बेटे के लिए बनाया। उनके टायर में लेदर के पाइप को ट्यूब की तरह इस्तेमाल किया गया था और इसके कुछ समय बाद ही रबर ट्यूब भी अस्तित्व में आ गई। जल्द ही इन टायरों को ऑटोमोबिल में इस्तेमाल किया जाने लगा। टायरों को बनाने के लिए जिस रबड़ का इस्तेमाल किया जाता है वह सफेद और बहुत मुलायम होती है। उतना ही जितनी मुलायम आपकी कोई सर्दियों की जैकेट हो, अब इसे हार्ड कैसे किया जाए। क्योंकि इतनी मुलायम चीज आप टायर की तरह इस्तेमाल तो नहीं कर सकते हैं। इस रबड़ को सख्त करने के लिए उसमें काला कार्बन और सल्फर मिलाया जाता है।
रबर को सख्त करने के लिए उसमें काफी अमाउंट में कार्बन और सल्फर का यूज होता है। यानी आपके टायर को कार्बन और सल्फर का ये जो मिश्रण है। यह अधिक से अधिक काला बना देता है। जितना काला आपका टायर होगा, उतना ही मजबूत और टिकाऊ होगा। इसकी मजबूती और ज्यादा सुनिश्चित करता है इसमें डलने वाला स्टील और लोहा ताकि जब सड़क पर पहिया घूमे तो किसी ठोकर या पत्थर के लगने से उसकी रिम को कोई नुकसान ना हो।

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दरअसल यह छोटे-छोटे रबड़ के बाल है। जो टायर को तैयार करते वक्त रबर मोल्डिंग और स्टीमिंग प्रोसेस के दौरान उस पर आ जाते हैं। इन्हें विंड स् प्यूस कहा जाता है। इनका टायर के परफॉर्मेंस से तो कोई लेना देना नहीं होता। यह सीधा-सीधा मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस का ही एक बाय प्रोडक्ट होते हैं।
जो टायर खराब हो जाते हैं उनको फिर से रिसाइकल किया जाता है। जो टायर घिस जाते हैं उन परे मशीन के जरिए रबर चढ़ाया जाता है। जो टायर रबड़ चढ़ने लायक नहीं होते, उसको वापस ले जाया जाता है फैक्ट्री। वहां उसे काटा जाता है और उसमें से निकलता है लाइट डीजल ऑयल जिसे हम एलडी भी कहते हैं या टायर ऑयल भी कहा जाता है। एलडी के अलावा टायर को काटने पर उसमें से निकलता है कार्बन लोहा और पानी। इन सभी चीजों को इकट्ठा कर लिया जाता है और ये सारी चीजें सड़क बनाने में काम आती है।

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