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जाने: कैसे होता है राज्यसभा में सदस्यों का चयन


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राज्यसभा संवैधानिक रूप से राज्यों की परिषद है और भारत की द्विसदनीय संसद का उच्च सदन है। इसका गठन 3 अप्रैल 1952 को हुआ था और इसका पहला सत्र 13 मई 1952 को आयोजित किया गया था। वर्ष 1918 में आए मोंटेग्यु चेम्सफोर्ड रिपोर्ट को राज्यसभा या दूसरे सदन की उत्पत्ति के स्रोत के रूप में देखा जाता है। इस रिपोर्ट ने एक द्विसदनीय विधायिका निचले सदन या केंद्रीय विधानसभा और उच्च सदन या राज्य परिषद की शुरुआत की।

राज्यसभा सदस्यों के चयन की प्रक्रिया

संविधान के अनुच्छेद 80 में राज्यसभा की अधिकतम संख्या 250 बताई गई है। जिसमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामित होते हैं और 238 सदस्य राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि होते हैं। हालांकि राज्यसभा की वर्तमान सदस्य संख्या 245 है। जिसमें से 233 सदस्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि हैं और 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामित हैं। राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य, साहित्य, विज्ञान, कला और सामाजिक सेवा जैसे मामलों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्ति होते हैं। राज्यसभा का प्रत्येक सदस्य 6 वर्ष की अवधि के लिए चुना जाता है। लोकसभा के विपरीत राज्यसभा कभी विघटित नहीं होती। बल्कि इसके एक तिहाई सदस्य हर दूसरे वर्ष के बाद से सेवा निवृत्त हो जाते हैं। केवल तीन केंद्र शासित प्रदेशों दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मूकश्मीर का राज्यसभा में प्रतिनिधित्व है।

राज्यसभा की विशेष शक्तियां

    1. अनुच्छेद 249 संसद को राज्य सूची के विषयों पर विधि निर्माण की अनुमति देता है। यदि राज्यसभा दो तिहाई बहुमत से इस आशय का प्रस्ताव पारित करती है।
    2. अनुच्छेद 312 संसद को संघ और राज्यों के लिए अखिल भारतीय सेवाओं का निर्माण करने की अनुमति देता है। यदि राज्यसभा इस आशय का प्रस्ताव पारित करती है।

राष्ट्रपति शासन की घोषणा

आमतौर पर ऐसी उद्घोषणा हों को संसद के दोनों सदनों के अनुमोदन की आवश्यकता होती है। लेकिन उद्घोषणा के समय यदि लोकसभा विघटित हो, तब राज्यसभा अकेले ही राष्ट्रपति शासन लगाने का अनुमोदन कर सकती है।

उपराष्ट्रपति को पद से हटाना

उपराष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए राज्यसभा ही पहल कर सकती है। इसका अर्थ यह है कि उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव केवल राज्यसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, लोकसभा में नहीं।

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