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बुधवार, 6 मार्च 2024

जाने: महाशिवरात्रि में रात्रि पूजा का महत्व

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यह समस्त ब्रह्मांड, शिव और शक्ति से उन्न हुआ है। जब इस संसार में कुछ नहीं था तब भी शिव थे और जब कुछ नहीं होगा तब भी शिव ही होंगे। दिन का समय ऊर्जा और शक्ति की देवी माता पार्वती जी का प्रतीक है। तो वहीं रात्रि प्रतीक है सदाशिव भोलेनाथ भगवान की, वर्ष भर की सभी शिवरात्रिओ में महाशिवरात्रि को विशेष माना गया है। महाशिवरात्रि शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना है। इसमें में महा का अर्थ है महान, भगवान शिव हमारे देवता है और रात्रि का अर्थ रात, इन तीनों शब्दों का सीधा मतलब है, भगवान शिव को समर्पित त्योहार।
महाशिवरात्रि की पूजा में विशेष रूप से आठों प्रहर की पूजा का विधान होता है। जैसे पूर्वा मध्यान अपरान साय काल प्रदोष निशित त्रियामा एवं उषा इनमें से चार प्रहर की पूजा तो अधिकतर जनमानस कर लेते हैं। पर प्रदोष काल से लेकर उषा प्रहर तक की रात्रि पूजा महत्त्वपूर्ण और विशेष कही गई है। इसमें प्रदोष काल का समय संध्या और रात्रि के मिलन का समय भगवान शिव की पूजा के लिए उत्तम माना गया है और महाशिवरात्रि पर तो संपूर्ण रात्रि ही उत्तम फलदाई बताई गई है।
ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को अर्धरात्रि के समय करोड़ों सूर्य के तेज के समान शिवलिंग प्रकट हुआ था। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा प्रदान करने में अक्षम होता है। क्योंकि सतयुग में रात्रि के समय चंद्रमा को गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में महादेव द्वारा क्षय दोष से मुक्त होने का अभयदान मिला था और पुनः धीरे-धीरे चंद्रमा को ऊर्जा प्राप्त होनी प्रारंभ हुई थी। साथ ही यहां सोम यानी चंद्रमा के कारण रात्रि में ही प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ की स्थापना हुई थी। इसलिए महाशिवरात्रि की रात आलौकिक शक्तियां प्राप्त करने का सर्वाधिक उपयुक्त समय माना जाता है। वेद पुराणों के अनुसार महाशिवरात्रि पर शिव और शक्ति के एकाकार स्वरूप की पूजा का विधान बताया गया है। इस दिन ही भगवान गौरी शंकर कहलाए और ब्रह्मा जी के तप से खुश होकर मध्यरात्रि में अर्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए।
शास्त्र कहते हैं कि महाशिवरात्रि की रात ही भगवान शिव ने तांडव नृत्य किया था। इस नृत्य को सृजन और विनाश की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन रात भर जागकर शिव और शक्ति स्वरूपा माता पार्वती की आराधना करने से भक्तों पर भगवान शिव माता पार्वती की विशेष कृपा होती है। महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। इसलिए महाशिवरात्रि की रात सोना नहीं चाहिए और शिव जी की आराधना करनी चाहिए। साथ ही पूरे वर्ष में केवल महाशिवरात्रि की रात ऐसी है, जिसमें किसी भी समय रुद्राभिषेक किया जा सकता है और इससे अक्ष पुण्य की प्राप्ति होती है। जिससे कैलाशपति महादेव प्रसन्न होते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महाशिवरात्रि प्रमुख मानी जाती है। कहा जाता है कि इस रात्रि ब्रह्मांड में ग्रह और नक्षत्रों की ऐसी स्थिति होती है। जिससे एक विशेष ऊर्जा का प्रवाह होता है। रात्रि जागरण करके इस ऊर्जा का उपयोग आत्म चेतना में किया जा सकता है। आध्यात्मिक रूप से बात की जाए तो प्रकृति इस रात मनुष्य को सीधे परमात्मा से जोड़ती है। इसका पूरा लाभ उठाने के लिए महाशिवरात्रि की रात में जागरण करने और रीढ की हड्डी सीधा करके ध्यान मुद्रा में बैठने की बात कही गई है। शिव महापुराण में तो यह भी जिक्र है कि इस दिन संपूर्ण जगत के माता-पिता अर्थात भगवान शिव माता पार्वती, नंदी पर विराजमान होकर संपूर्ण सृष्टि का भ्रमण करते हैं और अपने भक्तों पर कृपा कर झोली भर देते हैं।

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