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दया याचिका या मर्सी पिटीशन

mercy petition

हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नाबालिग बच्ची से बलात्कार और उसकी हत्या के मामले में दोषी व्यक्ति की दया याचिका खारिज कर दी है। आए जानते है कि दया याचिका क्या होती है
किसी ऐसे व्यक्ति जिसे मौत या कारावास की सजा सुनाई गई है। के द्वारा राष्ट्रपति या राज्यपाल से दया की याचना करते हुए किया गया। एक औपचारिक अनुरोध है। दया याचिका दायर करने की प्रक्रिया की बात करें तो दया याचिकाओं से निपटने के लिए कोई वैधानिक लिखित प्रक्रिया नहीं है। लेकिन व्यवहार में कोर्ट ने सभी राहत को समाप्त करने के बाद दोषी व्यक्ति या उसकी ओर से उसका रिश्ता राष्ट्रपति को लिखित याचिका प्रस्तुत कर सकता
है। राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा याचिका प्राप्त की जाती है, जिसे बाद में गृह मंत्रालय को उनकी टिप्पणियों और सिफारिशों के लिए भेज दिया जाता है। 
अब बात करते हैं इन्हें दायर करने के आधार की, तो दया का पाना कैदी का अधिकार नहीं है। वह इसका दावा नहीं कर सकता। दया उसके स्वास्थ्य, शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य उसकी पारिवारिक वित्तीय स्थितियों के आधार पर दी जाती है कि वह रोजी रोटी का एकमात्र अर्जक है या नहीं।
संवैधानिक व्यवस्था पर राष्ट्पति के पास दया याचिका भेजना किसी दोषी के पास अंतिम संवैधानिक उपाय है, जिसे वो तब इस्तेमाल कर सकता है। जब उसे कोर्ट द्वारा सजा सुनाई जा चुकी हो। कोई भी दोषी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को दया याचिका भेज सकता है। अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति के पास किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए। किसी भी व्यक्ति की सजा को क्षमा करने, उसे रोकने विराम देने या कम करने या सजा को निलंबित करने परिहार करने की शक्ति होगी। उन सभी मामलों में जहां सजा कोर्ट मार्शल द्वारा दी गई हो, उन सभी मामलों में जहां सजा किसी ऐसे मामले से संबंधित किसी कानून के खिलाफ अपराध के लिए है। जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है और सभी मामलों में जहां मौत की सजा दी गई है। इसी तरह अनुच्छेद 161 के तहत राज्य के राज्यपालों को क्षमा प्रदान करने की शक्ति दी गई है। 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल मृत्युदंड की सजा वाले कैदी को क्षमा कर सकता है, लेकिन कैदी न्यूनतम 14 साल की जेल की सजा काट चुका हो,
आए बात करते है न्यायिक समीक्षा की, एक गुरु सुधाकर और आंध्र प्रदेश सरकार 2006 एवं अन्य के मामले भी सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 72 और अनुच्छेद 161 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान शक्ति न्यायिक समीक्षा के अधीन है। अदालत ने कुछ आधार निर्धारित किए हैं जिनपर न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। जैसे यदि आदेश बेबुनियादी तरीके से पारित किया जाता है। यदि पारित आदेश दुर्भावना पूर्ण है। यदि आदेश पूरी तरह से अप्रासंगिक विचारों के प्रभाव में पारित किया गया है और अगर आदेश में मनमानी की भावना व्याप्त है।

याचिका से जुड़े अहम फैसले

  1. मारू राम बनाम भारत सन् 1981, इसमें sc ने माना कि अनुच्छेद 72 के तहत क्षमा प्रदान करने की शक्ति का प्रयोग मंत्री परिषद की सलाह पर किया जाना चाहिए।
  2. धनंजय चटर्जी पश्चिम बंगाल राज्य 1994, इसमें sc ने कहा, संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 के तहत शक्ति का प्रयोग केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा किया जा सकता है न कि राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा।


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