khan abdul ghaffar khan एक प्रमुख पश्तून नेता व समाज सुधारक थे। जिनका जन्म आज के दिन 6 फरवरी को हुआ था। जिन्होंने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। वह कई नामों जैसे सीमांत गांधी, बच्चा खान और बादशाह खान के नाम से लोकप्रिय थे। इनका जन्म 6 फरवरी 1890 को ब्रिटिश भारत में हुआ था। खान छोटी उम्र से ही शिक्षा व साक्षरता संबंधी सुधार कार्यों में शामिल रहे थे। 1919 में रोलेट एक्ट के आंदोलन के दौरान, उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। देश की आजादी में अपनी सक्रियता के परिणाम स्वरूप वह 1920 और 1947 के बीच कई बार जेल भी गए। उन्होंने खिलाफत आंदोलन में भी भाग लिया। 1929 में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया। इसके बाद गफार खान ने पश्तून के लिए लाल कुर्ती आंदोलन या खुदाई खिदमतगार की स्थापना की। वह विभाजन के विरोधी थे, किंतु बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए और वहां रहकर उन्होंने एक स्वायत पश्तून नि स्तान के लिए आंदोलन जारी रखा। अपने सिद्धांतों के कारण उन्होंने कई साल जेल में और बाद में अफगानिस्तान में बिताए और 1972 में वह पाकिस्तान लौटे। 1987 में वह भारत रत्न पाने वाले पहले गैर भारतीय बने। 20 जनवरी 1988 को 98 वर्ष की उम्र में पाकिस्तान के पेशावर में उनका निधन हो गया था।
khan abdul ghaffar khan एक प्रमुख पश्तून नेता व समाज सुधारक थे। जिनका जन्म आज के दिन 6 फरवरी को हुआ था। जिन्होंने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। वह कई नामों जैसे सीमांत गांधी, बच्चा खान और बादशाह खान के नाम से लोकप्रिय थे। इनका जन्म 6 फरवरी 1890 को ब्रिटिश भारत में हुआ था। खान छोटी उम्र से ही शिक्षा व साक्षरता संबंधी सुधार कार्यों में शामिल रहे थे। 1919 में रोलेट एक्ट के आंदोलन के दौरान, उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। देश की आजादी में अपनी सक्रियता के परिणाम स्वरूप वह 1920 और 1947 के बीच कई बार जेल भी गए। उन्होंने खिलाफत आंदोलन में भी भाग लिया। 1929 में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया। इसके बाद गफार खान ने पश्तून के लिए लाल कुर्ती आंदोलन या खुदाई खिदमतगार की स्थापना की। वह विभाजन के विरोधी थे, किंतु बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए और वहां रहकर उन्होंने एक स्वायत पश्तून नि स्तान के लिए आंदोलन जारी रखा। अपने सिद्धांतों के कारण उन्होंने कई साल जेल में और बाद में अफगानिस्तान में बिताए और 1972 में वह पाकिस्तान लौटे। 1987 में वह भारत रत्न पाने वाले पहले गैर भारतीय बने। 20 जनवरी 1988 को 98 वर्ष की उम्र में पाकिस्तान के पेशावर में उनका निधन हो गया था।
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