शनि की शांति हेतु शनिवार का व्रत सर्वमान्य है। शनि हेतु कम से कम 19 व्रत किए जा सकते हैं। यह व्रत मनस्ताप, रोग, शोक, भय, बाधा आदि से मुक्ति एवं शनिजन्य पीड़ा के निवारण के लिए विशेष रूप से फलदायक माना जाता है। इस दिन प्रातः स्नानोपरांत कृष्ण तिल और लौंग मिश्रित जल पश्चिम की ओर मुख करके पीपल वृक्ष पर चढ़ाकर शिवोपासना या हनुमत आराधना करनी चाहिए। साथ ही शनि की लौह प्रतिमा की पूजा करनी चाहिए। फिर शनिवार व्रत कथा का पाठ करना चाहिए। उड़द के बने पदार्थ वृद्ध विप्र को भेंट करना चाहिए और स्वयं सूर्यास्त के पश्चात् भोजन करना चाहिए। भोजन के पूर्व शनि की शांति हेतु 'ॐ शं शनैश्चराय नमः मंत्र का तीन-तीन माला जप करना चाहिए।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि प्रतिकूल होने पर अनेक कार्यों में असफलता देता है, कभी वाहन दुर्घटना, कभी यात्रा स्थागित, तो कभी क्लेश आदि से परेशानी बढ़ती जाती है। ऐसी स्थितियों में ग्रह पीड़ा निवारक शनि यंत्र की शुद्धतापूर्ण पूजा प्रतिष्ठा करने से अनेक लाभ मिलते हैं। यदि शनि की ढैया या साढ़ेसाती का समय हो तो इसे अवश्य पूजना चाहिए। श्रद्धापूर्वक इस यंत्र की प्रतिष्ठा करके प्रतिदिन यंत्र के सामने सरसों के तेल का दीप जलायें। नीला या काला पुष्प चढ़ायें, ऐसा करने से अनेक लाभ होंगे। मृत्यु, कर्ज, मुकद्दमा, हानि, क्षति, पैर आदि की हड्डी, वात रोग तथा सभी प्रकार के रोग से परेशान लोगों हेतु यंत्र अधिक लाभकारी है। नौकरी पेशा आदि लोगों को उन्नति शनि द्वारा ही मिलती है अतः यह यंत्र अति उपयोगी है, जिसके द्वारा शीघ्र ही लाभ पाया जा सकता है। मंत्र:
ॐ प्रां प्री प्रौं सः शनैश्चराय नमः।
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