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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

अचलेश्वर धाम: द्वापरयुग से यहाँ भगवान शिव शंकर जी के पुत्र भगवान् कार्तिक विराजमान है: अधिक जानकारी को पूरी खबर पढ़े और विडियो भी देखें



पंजाब के बटाला में भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय को समर्पित अचलेश्‍वर मंदिर का हिंदू धर्म में पौराणिक मान्‍यता है। भगवान शिव से रूष्‍ट होकर कार्तिकेय जी इसी स्‍थान पर आकर बसे जिसके बाद वे यहां अचलेश्‍वर के रूप में पूज्‍य बने। प्राचीन विशाल सरोवर के बीचों-बीच भगवान शंकर का विशाल मंदिर, किनारे पर कार्तिक जी का प्राचीन एवं ऐतिहासिक मंदिर है और दूसरी तरफ गुरुद्वारा देश की अखंडता व एकता का परिचायक है। ऐसा माना जाता है कि अचलेश्‍वर धाम में जो नौवीं के पर्व पर लगातार 40 दिन पवित्र सरोवर में स्नान कर सच्चे मन से पूजा अर्चना करे उसकी हर इच्‍छा पूरी होती है।
पौराणिक कथा
प्रचलित कथाओं के अनुसार भगवान शंकर जी व मां पार्वती ने अपने पुत्रों कार्तिक जी व गणेश जी का बुद्धि परीक्षण कर श्रेष्ठ को अपना उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय लिया। भोलेनाथ जी ने दोनों से तीनों लोकों की परिक्रमा कर सबसे पहले कैलाश पहुंचने को कहा। कार्तिक जी मयूर पर सवार होकर कुछ क्षणों में ही आंखों से ओझल हो गए और बुद्धिमान व माता पिता के प्रिय गणेश जी ने भगवान शंकर को ही तीनों लोकों का स्‍वामी मान उनकी परिक्रमा कर ली और भगवान शिव के उत्‍तराधिकारी बने। यह बात जानकर कार्तिकेय जी रूष्‍ट होकर धरती पर उतरकर तपस्या करने लगे। तो स्वयं भगवान शंकर और मां पार्वती 33 करोड़ देवी-देवताओं को साथ लेकर कार्तिक जी को मनाने यहां पधारे परन्तु कार्तिक जी ने जब कैलाश न जाकर यहीं अचल रहने का निर्णय सुनाया तो भगवान शिव ने उन्हें अचलेश्वर महादेव की उपाधि देकर नौवीं का अधिकारी घोषित किया। यही स्थान आज श्री अचलेश्वर महादेव तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है।

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