श्री गुरू रविदास महाराज जी के प्रकाश पर्व के शुभ अबसर पर दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से बस्ती नौ में करवाया गया सत्संग समागम
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से बस्ती नौ में श्री गुरू रविदास महाराज जी के प्रकाश पर्व पर सत्संग समागम का आयोजन किया गया जिसमें संस्थान की प्रवक्ता साध्वी भारती जी ने गुरू रविदास जी के जीवन और उनकी वाणी पर आधारित विचार दिए । गुरू रविदास जी ने समस्त मानव जाति को माया से निरासक्त भाव से ऊपर उठकर सत्य का संदेश दिया। महापुरूषों और ग्रन्थ शास्त्रों के अनुसार हमारे त्रिकुटि मंडल के पीछे एक अनंत अलौकिक संसार है। इसमें संपूर्ण ब्रह्माण्ड और उसका रचनाकार ब्रह्मा समाया है। पर हम इस संसार में स्वयं प्रवेश नहीं कर सकते। एक पूर्ण गुरू के पास ही इस संसार के द्वार की चाबी है। वे ही हमारा यह द्वार खोलकर इस संसार में प्रवेश करवा सकते हैं। यही वह दिव्य ज्ञान है जिसका जिक्र कबीर जी अपनी पहली अनुभूति के रूप में कर रहे हैं। परन्तु आज मानवीय इकाई की विडम्बना तो देखिए वह स्वयं को रविदास जी का भक्त भी कहता है और उनके बताए मार्ग पर अग्रसर भी नहीं होना चाहता। कबीर जी अंतर्जगत की दूसरी अनुभूति के बारे में बताते हैं कि लोग कहते हैं हमने प्रभु को अपने गीतों से व्यक्त किया लेकिन कबीर जी कहते हैं कि वह परमात्मा तो अव्यक्त, शब्दातीत, वाक्यों और इन्द्रियों से परे है। बाहरी संगीत चाहे कितना ही कर्णप्रिय क्यों न हो, पर उसे लगातार सुनने से आप कभी न कभी ऊब महसूस कर सकते हैं। परन्तु भीतरी अनहद संगीत तो ऐसा रोचक और रसीला है जिसके प्रति आपकी रूचि पल प्रतिपल बढ़ती ही जाती है। अपने छदों में तीसरी अनुभूति नाम सुमिरन की चर्चा करते हुए कहते हैं कि अध्यात्म जगत से संबंध रखने वाले अधिकतर लोग किसी विशेष मंत्र या प्रभु के गुणवाचक नाम को ही शाश्वत नाम समझ लेते हैं। उसी का सुमिरन करने लगते हैं। किन्तु लिखित व जीवित शास्त्रों के अनुसार प्रभु का वास्तविक नाम तो अक्षरातीत है। एक आदि कंपन है, अविनाशी स्पंदन है, जो हमारे प्राणों में सूक्ष्म रूप से समाया हुआ है। चौथी अनुभूति अमृत का रहस्योजागर करते हुए कहते हैं कि हमारे शरीर के शिरोस्थ भाग में गगन मंडल है जिसमें बेहिसाब अमृत स्थित है। जिसने सतगुरू से ब्रह्मज्ञान पाया है, वही साधक बिना प्याले के ही इस अमृत का पान कर पाता है। अंत में कबीर साहिब जी कहते हैं कि जो अपूर्व-अभूतपूर्व अंतर्जगत और उसकी इन दिव्यानुभूतियों को मुझे प्रत्यक्ष करा दे वही पूर्ण श्री गुरुदेव है। ब्रह्मज्ञान ही सच्चे गुरू की सच्ची कसौटी है। इसके अलावा अगर कोई कुछ देता है तो समझ लेना, कहीं न कहीं अपूर्णता है, समझौता है।

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